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झारखण्ड

बांस कारीगरों को मिलेगा नया बाजार

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट की टीम ने गोविंदपुर के बागडीह गांव में किया सर्वे; नई डिजाइन ट्रेनिंग, बैंक और बाजार से जोड़ने की तैयारी

धनबाद।  क्षेत्रीय संवाददाता : धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट की टीम ने गुरुवार को धनबाद जिले के गोविंदपुर प्रखंड अंतर्गत बागडीह गांव के मोहली टोला में पहुंचकर बांस से विभिन्न उपयोगी उत्पाद बनाने वाले कारीगर परिवारों से मुलाकात की। ट्रस्ट की ओर से आयोजित सर्वेक्षण अभियान का उद्देश्य गांव में पारंपरिक रूप से बांस शिल्प का कार्य कर रहे परिवारों की वास्तविक स्थिति, उनकी आय, उत्पादों की मांग, डिजाइन संबंधी जरूरतों तथा बाजार से जुड़ी समस्याओं को समझना रहा।

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट की General Secretary Sarita Singh के नेतृत्व में किए गए इस सर्वेक्षण के दौरान टीम ने कई बांस कारीगर परिवारों से सीधी बातचीत की। बातचीत में कारीगरों ने बताया कि वे वर्षों से बांस की टोकरी, सूप सहित विभिन्न घरेलू एवं उपयोगी वस्तुएं बनाते आ रहे हैं, लेकिन उनके उत्पादों को बाजार में अपेक्षित कीमत नहीं मिल पाती। कई कारीगरों ने यह भी कहा कि पारंपरिक डिजाइन तक सीमित रहने के कारण उनके उत्पादों की बाजार मांग सीमित है और उन्हें आधुनिक डिजाइन तथा उत्पाद विकास का प्रशिक्षण मिलने पर आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

सर्वेक्षण के दौरान ट्रस्ट की टीम ने कारीगरों की आवश्यकताओं को दर्ज किया और प्रशिक्षण के लिए संभावित लाभार्थियों की पहचान की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ट्रस्ट की ओर से बताया गया कि चयनित कारीगरों के समूह बनाकर शीघ्र ही EDP यानी Entrepreneurship Development Programme के तहत बांस शिल्प से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। प्रशिक्षण पूरा करने वाले कारीगरों को आगे Bank Linkage और Market Linkage से जोड़ने की दिशा में सहयोग दिया जाएगा।


बागडीह में 55-60 मोहली परिवारों की आजीविका बांस शिल्प पर निर्भर

सर्वेक्षण के दौरान सामने आया कि बागडीह गांव में लगभग 55 से 60 मोहली परिवार रहते हैं और इनमें से बड़ी संख्या पारंपरिक रूप से बांस से विभिन्न उत्पाद तैयार कर अपनी आजीविका चलाती है।

इन परिवारों के लिए बांस केवल एक कच्चा माल नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका का आधार है। बांस की टोकरी, सूप और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाना इन परिवारों की पारंपरिक कला का हिस्सा है। सीमित संसाधनों के बावजूद कारीगर अपने हाथों और पारंपरिक कौशल के आधार पर उत्पाद तैयार करते हैं।

हालांकि, सर्वेक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि पारंपरिक हुनर होने के बावजूद इन कारीगरों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

कारीगर उत्पाद तैयार करते हैं, लेकिन उत्पादों की बिक्री के लिए उन्हें स्थानीय बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है। बिचौलियों, सीमित बाजार, पारंपरिक डिजाइन और आधुनिक ग्राहक की बदलती पसंद जैसी चुनौतियां उनकी आय को प्रभावित करती हैं।

यही वह क्षेत्र है जहां धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट ने हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस की है।


“उत्पाद बनाते हैं, लेकिन उचित कीमत नहीं मिलती”

सर्वेक्षण के दौरान कारीगर Motilal Mohali ने अपनी समस्या बताते हुए कहा कि वे बांस के उत्पाद बनाते हैं, लेकिन उनके उत्पादों को बाजार में अच्छी कीमत नहीं मिल पाती।

Motilal Mohali की यह बात इस पूरे सर्वेक्षण की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में से एक रही।

कारीगरों की समस्या केवल उत्पादन की नहीं है। वे उत्पाद बनाना जानते हैं, लेकिन उत्पाद को सही बाजार तक पहुंचाने, उसकी कीमत तय करने, पैकेजिंग करने और ग्राहक की मांग के अनुसार उसमें बदलाव करने की जानकारी सीमित है।

यानी समस्या यह नहीं है कि हाथों में हुनर नहीं है।

समस्या यह है कि हुनर को बाजार से जोड़ने की व्यवस्था कमजोर है।

एक कारीगर यदि एक टोकरी तैयार करने में कई घंटे लगाता है, लेकिन उसे उसके श्रम, कच्चे माल और कौशल के अनुरूप कीमत नहीं मिलती, तो पारंपरिक कला धीरे-धीरे आर्थिक रूप से कमजोर हो जाती है।

यही कारण है कि केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशिक्षण के साथ बाजार तक पहुंच भी जरूरी होगी।

धनशृष्टि की टीम ने इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आगे की योजना तैयार करने की बात कही है।


नई डिजाइन सीखने की जरूरत

कारीगर Ram Chandra Mohali और Sukumuni Mohali ने बातचीत के दौरान बांस उत्पादों के लिए नई डिजाइन की ट्रेनिंग की आवश्यकता बताई।

उन्होंने कहा कि यदि उन्हें आधुनिक डिजाइन के अनुसार बांस के उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण मिले तो बाजार में उनके उत्पादों की मांग बढ़ सकती है।

यह मांग वर्तमान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर संकेत करती है।

आज ग्राहक केवल पारंपरिक उपयोगी वस्तुएं ही नहीं खरीदता। बाजार में सजावटी सामान, घरेलू सजावट, कार्यालय उपयोग की वस्तुएं, उपहार सामग्री, पूजा सामग्री, लैंप शेड, स्टोरेज उत्पाद, ट्रे, टोकरी के आधुनिक रूप और अन्य हस्तशिल्प उत्पादों की भी मांग है।

यदि पारंपरिक बांस कारीगर इन बदलती जरूरतों के अनुसार डिजाइन विकसित कर सकें, तो उनके लिए बाजार का दायरा बढ़ सकता है।

यही कारण है कि ट्रस्ट द्वारा प्रस्तावित EDP in Bamboo Craft Training Programme को केवल हस्तकला प्रशिक्षण के रूप में नहीं बल्कि उद्यमिता विकास से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है।


सर्वेक्षण के बाद प्रशिक्षण के लिए चयन शुरू

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट की टीम ने सर्वेक्षण के दौरान कारीगरों की समस्याओं और आवश्यकताओं को दर्ज किया। सर्वेक्षण के आधार पर उन कारीगरों की पहचान शुरू कर दी गई है जिन्हें प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

ट्रस्ट के अनुसार, चयनित कारीगरों के समूह तैयार किए जाएंगे और उनके लिए चरणबद्ध तरीके से प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट द्वारा बागडीह गांव, गोविंदपुर, धनबाद के बांस शिल्प कारीगरों के कौशल विकास एवं स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए EDP (उद्यमिता विकास कार्यक्रम) का आयोजन National Entrepreneurship & Industrial Development Corporation (NEIDCO), New Delhi के सहयोग से किया जाएगा।

कार्यक्रम के अंतर्गत कारीगरों को बांस शिल्प की नई डिजाइन, उत्पाद विकास, व्यवसाय प्रबंधन, लागत निर्धारण एवं बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण के बाद चयनित एवं प्रमाणित कारीगरों को बैंक लिंकेज, मार्केट लिंकेज तथा स्वरोजगार विस्तार के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।

कारीगरों को बैंक लिंकेज, मार्केट लिंकेज तथा स्वरोजगार विस्तार के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करने का प्रयास किया जाएगा।

इस प्रशिक्षण में केवल बांस से उत्पाद बनाने की तकनीक ही नहीं बल्कि उत्पाद विकास, नई डिजाइन, गुणवत्ता, बाजार की मांग और उद्यमिता से जुड़े विषयों को भी शामिल किए जाने की योजना है।

इसका उद्देश्य यह है कि कारीगर केवल मजदूरी आधारित उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि भविष्य में अपने छोटे व्यवसाय को व्यवस्थित तरीके से संचालित कर सकें।


सरिता सिंह ने दिया प्रशिक्षण का आश्वासन

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट की General Secretary Sarita Singh ने सर्वेक्षण के दौरान कारीगरों से बातचीत की और उनकी समस्याओं को समझा।

उन्होंने कारीगरों को आश्वस्त किया कि ट्रस्ट की ओर से बहुत जल्द EDP in Bamboo Craft Training Programme आयोजित किया जाएगा।

उनके अनुसार, प्रशिक्षण का उद्देश्य कारीगरों को नई डिजाइन, उत्पाद विकास और बाजार की जरूरतों के अनुरूप कार्य करने में सक्षम बनाना है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रशिक्षण के बाद प्रमाणित कारीगरों को केवल प्रमाणपत्र देकर छोड़ने के बजाय उन्हें आगे की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

योजना के अनुसार, प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कारीगरों को Bank Linkage और Market Linkage की सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जाएगा।

यानी प्रशिक्षण के बाद अगला कदम वित्त और बाजार दोनों से जोड़ना होगा।

 


प्रशिक्षण के बाद बैंक और बाजार से जुड़ाव

ग्रामीण कारीगरों के सामने अक्सर एक बड़ी समस्या यह होती है कि उन्हें प्रशिक्षण तो मिल जाता है, लेकिन प्रशिक्षण के बाद व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी और बाजार उपलब्ध नहीं होता।

धनशृष्टि की प्रस्तावित योजना में इस अंतर को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।

यदि कोई कारीगर नई डिजाइन सीखकर उत्पाद तैयार करता है, तो उसके लिए कच्चा माल खरीदने, उपकरण जुटाने, उत्पादन बढ़ाने और उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी।

इसीलिए ट्रस्ट की योजना में Bank Linkage को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।

दूसरी ओर, केवल बैंक ऋण मिलने से भी व्यवसाय सफल नहीं होता।

यदि उत्पाद बिकेगा नहीं तो कर्ज चुकाना कठिन हो सकता है।

इसलिए Market Linkage को समान महत्व देना आवश्यक होगा।

बांस कारीगरों के लिए बाजार से जुड़ाव का अर्थ स्थानीय हाट से आगे बढ़कर संभावित संस्थागत खरीदारों, दुकानों, मेलों, हस्तशिल्प बाजारों, ऑनलाइन बिक्री माध्यमों और अन्य बाजार अवसरों तक पहुंच बनाना हो सकता है।


अप्रैल 2027 से Micro Finance की प्रस्तावित योजना

सर्वेक्षण कार्यक्रम के दौरान धनशृष्टि की Support Team तथा दिल्ली National Office से जुड़े Harshit Rastogi भी उपस्थित रहे।

उन्होंने बताया कि धनशृष्टि के Micro Finance Division के तहत अप्रैल 2027 से Joint Liability Groups (JLGs) को Micro Finance उपलब्ध कराने की योजना पर काम किया जा रहा है।

इस योजना के तहत छोटे व्यवसाय शुरू करने या विस्तार करने के इच्छुक समूहों को वित्तीय सहायता से जोड़ने का प्रस्ताव है।

प्रस्तावित गतिविधियों में कपड़ा दुकान, पूजा सामग्री की दुकान, सिलाई दुकान, सब्जी दुकान जैसे छोटे व्यवसाय शामिल हैं। इसके साथ ही Bamboo Craft से जुड़े कारीगरों को भी माइक्रो फाइनेंस से जोड़ने की योजना बताई गई।

यदि यह योजना निर्धारित रूप में लागू होती है, तो बांस कारीगरों के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ सकता है क्योंकि उनके व्यवसाय में कच्चे माल, उत्पादन और बिक्री के बीच पूंजी की आवश्यकता बनी रहती है।


बांस शिल्प को घरेलू काम से व्यवसाय में बदलने की कोशिश

ग्रामीण क्षेत्रों में कई पारंपरिक कारीगर अपने काम को व्यवसाय की तरह नहीं बल्कि पारिवारिक आजीविका की गतिविधि के रूप में संचालित करते हैं।

वे उत्पाद बनाते हैं।

स्थानीय ग्राहक को बेचते हैं।

जो पैसा मिलता है, उससे परिवार चलता है।

लेकिन व्यवसाय का विस्तार नहीं हो पाता।

बागडीह के मोहली परिवारों के मामले में भी यही चुनौती दिखाई देती है।

यदि इन्हें डिजाइन, लागत निर्धारण, गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, बाजार और वित्तीय प्रबंधन की जानकारी मिलती है, तो पारंपरिक कौशल को छोटे उद्यम में बदला जा सकता है।

यह परिवर्तन केवल आय बढ़ाने का माध्यम नहीं हो सकता, बल्कि नई पीढ़ी को भी इस पारंपरिक कला से जोड़ने में मदद कर सकता है।

क्योंकि जब किसी पारंपरिक हुनर से सम्मानजनक आय नहीं होती, तो युवा पीढ़ी स्वाभाविक रूप से दूसरे रोजगार की तलाश करती है।


“बांस की टोकरी से बाजार तक” लंबा सफर

बांस की एक साधारण टोकरी को तैयार करने में कारीगर का श्रम दिखाई नहीं देता।

ग्राहक बाजार में केवल अंतिम उत्पाद देखता है।

लेकिन कारीगर के लिए उसके पीछे कच्चे बांस की व्यवस्था, उसे काटना, तैयार करना, आकार देना, बुनाई करना और अंतिम रूप देना शामिल होता है।

यदि यही उत्पाद बाजार की मांग के अनुरूप डिजाइन में तैयार किया जाए, उसकी गुणवत्ता बेहतर हो और उसकी पैकेजिंग आकर्षक हो, तो उसका बाजार मूल्य बढ़ सकता है।

लेकिन इसके लिए कारीगर को नए कौशल सीखने होंगे।

यहीं EDP प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल पुराने हुनर को दोहराना नहीं बल्कि उसी हुनर को बाजार की नई जरूरतों के अनुरूप विकसित करना होना चाहिए।


महिलाओं की भागीदारी भी बन सकती है अवसर

बांस शिल्प से जुड़े ग्रामीण परिवारों में महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। कई पारंपरिक हस्तशिल्प गतिविधियों में महिलाएं उत्पादन, बुनाई, फिनिशिंग और घरेलू स्तर पर उत्पाद तैयार करने में योगदान देती हैं।

यदि प्रशिक्षण को समूह आधारित बनाया जाता है तो महिलाओं को भी उद्यमिता, वित्तीय साक्षरता और बाजार से जुड़ने के अवसर मिल सकते हैं।

Joint Liability Group जैसी संरचनाएं भी सामूहिक वित्तीय गतिविधियों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, बशर्ते उनकी संरचना, ऋण शर्तें, पुनर्भुगतान क्षमता और वित्तीय जोखिम स्पष्ट रूप से समझाए जाएं।

इसलिए भविष्य की योजना में प्रशिक्षण के साथ वित्तीय जागरूकता को भी शामिल करना उपयोगी होगा।


सर्वेक्षण से सामने आया एक बड़ा संदेश

बागडीह में किया गया यह सर्वेक्षण केवल एक गांव की समस्या का दस्तावेज नहीं है।

यह झारखंड के कई ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद पारंपरिक कारीगरों की एक व्यापक चुनौती की ओर भी संकेत करता है।

हमारे गांवों में हुनर की कमी नहीं है।

कमी अक्सर बाजार, डिजाइन, वित्त, तकनीक और संस्थागत सहयोग की होती है।

एक तरफ आधुनिक बाजार तेजी से बदल रहा है।

दूसरी तरफ ग्रामीण कारीगर अभी भी कई स्थानों पर दशकों पुराने डिजाइन और बिक्री प्रणाली पर निर्भर हैं।

इस दूरी को कम करने के लिए सरकारी संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों, वित्तीय संस्थानों और बाजार से जुड़े संगठनों के बीच समन्वय की आवश्यकता है।

धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट द्वारा बागडीह में किया गया सर्वेक्षण इसी दिशा में एक प्रारंभिक कदम के रूप में देखा जा सकता है।


अब असली परीक्षा प्रशिक्षण के बाद होगी

किसी भी विकास कार्यक्रम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने लोगों को प्रशिक्षण दिया गया।

असली सवाल यह होता है—

प्रशिक्षण के बाद कितने लोगों की आय बढ़ी?

कितने नए उत्पाद बाजार में पहुंचे?

कितने कारीगरों को बैंकिंग सुविधा मिली?

कितने उत्पाद नए बाजार तक पहुंचे?

क्या कारीगरों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिला?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या अगली पीढ़ी इस पारंपरिक काम को सम्मानजनक व्यवसाय के रूप में अपनाने लगी?

यदि इन सवालों के सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तभी प्रशिक्षण और माइक्रो फाइनेंस की योजना का वास्तविक प्रभाव माना जाएगा।


हुनर है, जरूरत बाजार की है

धनबाद के गोविंदपुर प्रखंड के बागडीह गांव में धनशृष्टि भविष्‍य निधि ट्रस्ट के सर्वेक्षण ने एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है।

लगभग 55-60 मोहली परिवारों की पारंपरिक आजीविका बांस शिल्प से जुड़ी है। कारीगरों के पास कौशल है, अनुभव है और पीढ़ियों से चली आ रही कला है, लेकिन उन्हें उचित मूल्य, आधुनिक डिजाइन और व्यापक बाजार की जरूरत है।

Motilal Mohali ने उचित कीमत की समस्या बताई, जबकि Ram Chandra Mohali और Sukumuni Mohali ने नई डिजाइन की ट्रेनिंग की आवश्यकता सामने रखी।

इन मांगों को केवल शिकायत के रूप में देखने के बजाय इन्हें ग्रामीण उद्यमिता के अवसर के रूप में देखा जा सकता है।

धनशृष्टि की योजना के अनुसार अब प्रशिक्षण के लिए कारीगरों की पहचान शुरू हो गई है। चयनित समूहों को EDP in Bamboo Craft Training देने, प्रशिक्षण के बाद Bank Linkage और Market Linkage उपलब्ध कराने तथा आगे Micro Finance से जोड़ने की दिशा में काम किया जाएगा।

अप्रैल 2027 से प्रस्तावित Micro Finance योजना में Bamboo Craft को भी शामिल किए जाने की बात सामने आई है।

अब बागडीह के कारीगरों के सामने एक नई उम्मीद है—बांस की टोकरी और सूप बनाने वाला हाथ शायद आने वाले समय में बाजार की मांग के अनुसार नए डिजाइन, नए उत्पाद और नया व्यवसाय भी तैयार कर सके।

क्योंकि ग्रामीण विकास का सबसे टिकाऊ रास्ता अक्सर बाहर से रोजगार लाने में नहीं, बल्कि गांव में मौजूद हुनर को बाजार से जोड़ने में छिपा होता है।

बागडीह के मोहली कारीगरों के पास हुनर पहले से है।

अब जरूरत है उस हुनर को प्रशिक्षण, वित्त और बाजार की तीन मजबूत सीढ़ियों से जोड़ने की।

और यदि यह प्रयास जमीन पर सफल होता है, तो बांस की साधारण टोकरी केवल घर की जरूरत नहीं रहेगी—वह एक छोटे ग्रामीण उद्यम की पहचान भी बन सकती है।

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