दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि, रामगढ़ में प्रतिमा अनावरण के साथ संघर्ष और स्वाभिमान की विरासत को किया गया नमन
पुण्यतिथि पर भावुक हुआ झारखंड, लुकैयाटांड़ स्थित सोना-सोबरन विद्यालय परिसर में प्रतिमा का अनावरण; नई पीढ़ी को इतिहास और सामाजिक संघर्षों से जोड़ने का संदेश

रांची-रामगढ़ I रिपोर्ट-क्षेत्रीय संवाददाता: झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ और आदिवासी समाज की अस्मिता के प्रतीक रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पुण्यतिथि पर सोमवार को पूरे राज्य में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। यह दिन न केवल उनके परिवार, बल्कि झारखंड सहित देशभर के आदिवासी, दलित, शोषित, वंचित और पिछड़े समाज के लिए भी गहन भावनाओं और स्मृतियों से जुड़ा रहा।
श्रद्धांजलि संदेश में कहा गया कि यह दिन परिवार के लिए अत्यंत भावुक और पीड़ादायक है, लेकिन यह दुःख केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। दिशोम गुरु के निधन ने उन लाखों लोगों को भी भावुक कर दिया, जिन्होंने उन्हें सामाजिक न्याय, जल-जंगल-जमीन और जनाधिकारों की लड़ाई का सशक्त नेतृत्वकर्ता माना।
संघर्ष की विरासत को किया गया याद
संदेश में कहा गया कि जीवन और मृत्यु प्रकृति का अटल नियम है। इस धरती पर जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक दिन पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन कुछ व्यक्तित्व अपने विचारों, संघर्षों और जनसेवा के कारण सदैव लोगों के हृदय में जीवित रहते हैं। दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन भी इसी प्रेरणा का प्रतीक है।
उनके सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों ने झारखंड की पहचान को नई दिशा दी तथा वंचित और उपेक्षित वर्गों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी।
रामगढ़ में प्रतिमा का हुआ अनावरण
पुण्यतिथि के अवसर पर रामगढ़ जिले के लुकैयाटांड़ स्थित सोना-सोबरन विद्यालय परिसर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया गया। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनके संघर्षमय जीवन को याद किया।
प्रतिमा स्थापना का उद्देश्य केवल एक स्मारक का निर्माण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास, संस्कृति और सामाजिक संघर्षों से परिचित कराना बताया गया।
नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का प्रयास
कार्यक्रम में कहा गया कि समाज तभी मजबूत बनता है, जब वह अपने इतिहास और पूर्वजों के संघर्षों को याद रखता है। प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देगी कि सामाजिक न्याय और अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले महापुरुषों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि युवा पीढ़ी को अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के विकास में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

शोषण के खिलाफ संघर्ष से मिली नई पहचान
श्रद्धांजलि संदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि आज़ादी से पहले और उसके बाद भी आदिवासी, दलित, पिछड़े और वंचित समाज ने अनेक प्रकार के सामाजिक एवं आर्थिक शोषण का सामना किया। ऐसे कठिन दौर में अनेक महान नेताओं और समाज सुधारकों ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जीवन भी इसी संघर्ष की एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों की आवाज़ को मजबूत मंच प्रदान करने का प्रयास किया और सामाजिक न्याय की दिशा में अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया।
संघर्ष, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना का संदेश
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने कहा कि दिशोम गुरु का जीवन केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज में स्वाभिमान, आत्मसम्मान और अधिकारों की चेतना जगाने का कार्य किया। उनका जीवन संघर्ष, सेवा और जनसमर्पण का प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
वक्ताओं ने कहा कि उनकी स्मृतियां और विचार आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकारों, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए सदैव प्रेरित करते रहेंगे।
श्रद्धांजलि के साथ लिया संकल्प
पुण्यतिथि के अवसर पर उपस्थित लोगों ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन के आदर्शों पर चलने, सामाजिक समरसता को मजबूत बनाने तथा वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का समापन दो मिनट का मौन रखकर तथा दिशोम गुरु को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए किया गया। उपस्थित लोगों ने विश्वास व्यक्त किया कि उनका संघर्ष, विचार और समाज के प्रति समर्पण आने वाले वर्षों तक जनमानस को प्रेरित करता रहेगा।












