Advertisement
विश्लेषण

“बुलडोज़र का न्याय या व्यवस्था की विफलता ?

इमारतें रातों-रात नहीं बनतीं, फिर जिम्मेदार कौन?"

विश्लेषण : रामपुर-उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है। खबर है कि विश्वविद्यालय परिसर की कई इमारतों को लेकर प्रशासन ने निर्माण संबंधी नियमों के उल्लंघन का मामला उठाया है और कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। सवाल केवल इतना नहीं है कि भवन वैध थे या अवैध। बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी परिसर में दर्जनों भवन बिना स्वीकृत नक्शे या आवश्यक अनुमति के बन गए, तो यह सब वर्षों तक प्रशासन की नजर से कैसे ओझल रहा?

यहीं से व्यंग्य जन्म लेता है।

इमारतें एक रात में नहीं उगतीं

एक साधारण नागरिक अपने घर की एक अतिरिक्त बालकनी बनाने से पहले नगर निकाय के चक्कर लगाता है। नक्शा पास कराइए, एनओसी लीजिए, निरीक्षण कराइए, टैक्स दीजिए। फिर भी कई बार फाइल महीनों तक घूमती रहती है।

लेकिन यदि किसी बड़े परिसर में अनेक बहुमंजिला भवन खड़े हो जाएं, तो स्वाभाविक सवाल उठता है—क्या प्रशासन उस समय सो रहा था? या फिर सब कुछ सबकी जानकारी में हो रहा था?

यदि नियमों का उल्लंघन हुआ, तो जिम्मेदारी केवल निर्माण करने वाले की है या निगरानी करने वाली व्यवस्था की भी?

बुलडोज़र सबसे आसान समाधान?

आजकल ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासनिक शब्दकोश में सबसे लोकप्रिय शब्दों में एक है—“बुलडोज़र”

नोटिस… बुलडोज़र।

विवाद… बुलडोज़र।

अतिक्रमण… बुलडोज़र।

लेकिन क्या हर समस्या का समाधान केवल ढहाना है?

यदि कोई भवन वास्तव में अवैध है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। परंतु यह भी विचारणीय है कि क्या हर मामले में ध्वस्तीकरण ही सबसे उपयुक्त विकल्प है? क्या संपत्ति का अधिग्रहण, नियमितीकरण (जहाँ कानून अनुमति दे), जुर्माना या अन्य वैधानिक उपाय उपलब्ध नहीं हो सकते?

सरकारी विभाग की जिम्मेदारी कहाँ गई?

व्यंग्य पूछता है—

जब पहली ईंट रखी गई थी, तब निरीक्षक कहाँ था?

जब दूसरी मंजिल बनी, तब इंजीनियर कहाँ थे?

जब तीसरी मंजिल तैयार हुई, तब नगर निकाय क्या कर रहा था?

और जब पूरा परिसर बन गया, तब अचानक कानून की आंख खुली?

यदि निगरानी तंत्र समय पर सक्रिय होता, तो शायद इतनी बड़ी कार्रवाई की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

कानून का उद्देश्य सुधार है या केवल दंड?

कानून व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज में अनुशासन स्थापित करना है। दंड आवश्यक है, लेकिन दंड का उद्देश्य केवल विनाश नहीं होना चाहिए।

यदि किसी भवन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य या सार्वजनिक हित के कार्यों में हो रहा हो, तो न्यायालय और प्रशासन परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। हर मामला अपने तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर तय होता है।

यही कारण है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और विधिक प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए।

व्यंग्य कहता है—सलाहकारों की भी परीक्षा होनी चाहिए

हमारे यहां सलाह देने वालों की कभी कमी नहीं रही।

एक सलाहकार कहेगा—

“सर, बुलडोज़र चलाइए।”

दूसरा कहेगा—

“कड़ा संदेश जाएगा।”

तीसरा कहेगा—

“टीवी पर अच्छा दिखेगा।”

लेकिन कोई यह नहीं पूछता—

“सर, सरकारी संपत्ति की कीमत कितनी है?”

“जनता का नुकसान कितना होगा?”

“करदाताओं का पैसा किस पर खर्च हुआ?”

व्यंग्य यहीं मुस्कुरा देता है।

अगर अवैध है तो सरकारी संपत्ति क्यों नहीं?

मान लीजिए कोई निर्माण न्यायालय के अंतिम आदेश के बाद अवैध घोषित हो जाता है और कानून ध्वस्तीकरण की अनुमति देता है।

फिर भी सार्वजनिक विमर्श का एक प्रश्न हो सकता है—

क्या कुछ परिस्थितियों में, यदि कानून अनुमति दे, ऐसी परिसंपत्तियों का सार्वजनिक उपयोग संभव है?

क्या उन्हें स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, अनुसंधान केंद्र या सरकारी कार्यालय के रूप में विकसित किया जा सकता है?

यह प्रश्न नीति-निर्माण का है, जिसका उत्तर संबंधित कानून और न्यायिक आदेशों के दायरे में ही तय होगा।

गरीब की झोपड़ी बनाम बड़ी इमारत

जब किसी गरीब की झोपड़ी टूटती है, तो वह पूछता है—

“साहब, बसने दिया किसने था?”

जब किसी बड़े निर्माण पर कार्रवाई होती है, तो लोग पूछते हैं—

“अनुमति दी किसने थी?”

दोनों प्रश्न अलग हैं, लेकिन जड़ एक ही है—प्रशासनिक जवाबदेही।

राजनीति और बुलडोज़र

बुलडोज़र अब केवल निर्माण मशीन नहीं रहा। कई बार वह राजनीतिक बहस का प्रतीक बन जाता है।

समर्थक कहते हैं—

“कानून का राज।”

आलोचक कहते हैं—

“चयनात्मक कार्रवाई।”

लोकतंत्र कहता है—

“सभी मामलों में समान कानून, समान प्रक्रिया और समान न्याय।”

यही संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है।

सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?

यदि किसी अवैध निर्माण पर कार्रवाई होती है, तो क्या केवल निर्माणकर्ता जिम्मेदार होगा?

या फिर उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी—

  • जिन्होंने निरीक्षण नहीं किया,
  • जिन्होंने अनुमति प्रक्रिया की निगरानी नहीं की,
  • जिन्होंने समय रहते कार्रवाई नहीं की,
  • या जिन्होंने नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज किया?

यदि केवल भवन टूटे और व्यवस्था जस की तस रहे, तो समस्या दोबारा जन्म ले सकती है।

विश्लेषण : कानून का राज, लेकिन जवाबदेही भी

कानून का सम्मान लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि किसी निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो वैधानिक कार्रवाई होना स्वाभाविक है। लेकिन उतना ही आवश्यक है कि कार्रवाई पारदर्शी हो, समान रूप से लागू हो और पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करे।

व्यंग्य अंत में बस इतना कहता है—

“दीवारें गिराना आसान है, लेकिन व्यवस्था की खामियों को गिराना कठिन।”

“यदि हर अवैध निर्माण के साथ उस अधिकारी की भी जवाबदेही तय हो, जिसकी निगरानी में वह बना, तो शायद भविष्य में बुलडोज़रों की जरूरत कम पड़े।”

और आखिर में नागरिक मुस्कुराकर पूछता है—

“साहब, इमारत तो आपने गिरा दी… अब बताइए, उसे बनने दिया किसने था?”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
.site-below-footer-wrap[data-section="section-below-footer-builder"] { margin-bottom: 40px;}