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धर्म संस्कृति

श्री जगन्नाथ मंदिर- गोपालगंज में भक्ति और आस्था के माहौल में मनाई गई देव स्नान पूर्णिमा,

सरबजीत सिंह

निरसा: निरसा क्षेत्र के गोपालगंज स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में सोमवार को देव स्नान पूर्णिमा यात्रा उत्सव श्रद्धा, भक्ति और वैदिक परंपराओं के साथ धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र एवं देवी सुभद्रा का 108 पवित्र कलशों के जल से महाभिषेक किया गया। पूरे मंदिर परिसर में “जय जगन्नाथ” के जयघोष, हरिनाम संकीर्तन और भजन-कीर्तन से आध्यात्मिक वातावरण गुंजायमान रहा।

देव स्नान पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ की वार्षिक स्नान यात्रा का विशेष पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान को 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराने के बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं और अगले 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि को “अनसर काल” कहा जाता है, जिसमें भगवान के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं।

108 कलशों से हुआ महाभिषेक

मंदिर के पुजारी शुभम प्रभु ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा का 108 कलशों के पवित्र जल से अभिषेक कराया। इसके साथ ही भगवान को श्रद्धा स्वरूप 108 आम अर्पित किए गए। पूरे अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालु भक्ति-भाव से पूजा-अर्चना करते रहे और भगवान से सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की।

स्नान अनुष्ठान के बाद विशेष श्रृंगार एवं आरती का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया।

हरिनाम संकीर्तन से भक्तिमय हुआ वातावरण

प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में हरिनाम संकीर्तन, भजन एवं आरती का आयोजन शुरू हो गया था। भक्तों ने पूरे उत्साह के साथ भक्ति गीतों का गायन किया। ढोल, मृदंग, झांझ और करताल की मधुर ध्वनि के बीच पूरा वातावरण भक्तिरस में सराबोर हो गया।

श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर परिवार एवं समाज के कल्याण की प्रार्थना की। मंदिर परिसर में दिनभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

15 दिनों के लिए विश्राम पर गए भगवान

धार्मिक परंपरा के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए विश्राम पर चले जाते हैं। इस अवधि में मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं।

मान्यता है कि अत्यधिक स्नान के कारण भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें औषधीय उपचार एवं विश्राम दिया जाता है। इस दौरान विशेष सेवायत भगवान की सेवा करते हैं तथा आयुर्वेदिक परंपराओं के अनुसार उनकी सेवा-पूजा संपन्न होती है।

 

रथ यात्रा से पहले खुलेंगे मंदिर के कपाट

मंदिर प्रबंधन ने बताया कि आज से भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए हैं। अब आगामी रथ यात्रा से एक दिन पूर्व विशेष पूजा-अर्चना के बाद मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाएंगे। इसके बाद श्रद्धालु नवयौवन रूप में भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर सकेंगे।

रथ यात्रा से पूर्व होने वाले इस दर्शन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अवसर की प्रतीक्षा करते हैं।

महाप्रसाद के रूप में वितरित हुई खिचड़ी

देव स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के बीच खिचड़ी महाप्रसाद का वितरण किया गया। भक्तों ने श्रद्धापूर्वक महाप्रसाद ग्रहण किया और इसे भगवान का दिव्य आशीर्वाद माना।

मंदिर समिति के सदस्यों एवं स्वयंसेवकों ने महाप्रसाद वितरण की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया, जिससे सभी श्रद्धालुओं को बिना किसी असुविधा के प्रसाद प्राप्त हो सका।

धार्मिक परंपरा का विशेष महत्व

देव स्नान पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ की वार्षिक स्नान यात्रा का प्रमुख पर्व माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है, लेकिन देशभर के जगन्नाथ मंदिरों में इसे समान श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है।

इस दिन भगवान को शीतल जल से स्नान कराने, विशेष भोग अर्पित करने और भक्तों को महाप्रसाद वितरण की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके बाद भगवान के विश्राम काल और फिर भव्य रथ यात्रा का आयोजन होता है, जिसका श्रद्धालु पूरे वर्ष इंतजार करते हैं।

बड़ी संख्या में शामिल हुए श्रद्धालु

इस धार्मिक आयोजन में मनजीत सिंह, मधुसूदन गोरी, शैलेंद्र सिंह, प्रमोद चंद्र, नदीया नंददास, प्रदीप मंडल, सुभाष मंडल, रविंद्र प्रधान, विजय विशाल, दशरथ दा, झंगू दा, मोहन अग्रवाल, दुर्योधन, रमेश, कार्तिक धीवार सहित बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।

सभी भक्तों ने भगवान जगन्नाथ की पूजा-अर्चना कर परिवार, समाज और राष्ट्र की सुख-समृद्धि एवं शांति की कामना की।

आस्था का अद्भुत संगम

गोपालगंज स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में आयोजित देव स्नान पूर्णिमा उत्सव ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति में धार्मिक पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज को एक सूत्र में बांधने का माध्यम भी बनते हैं। भक्ति, सेवा, महाप्रसाद और सामूहिक सहभागिता के साथ संपन्न यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बन गया।

अब श्रद्धालुओं की निगाहें आगामी भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा पर टिकी हैं, जब 15 दिनों के विश्राम के बाद भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देंगे और पूरे क्षेत्र में श्रद्धा एवं उत्साह का अद्भुत वातावरण देखने को मिलेगा।

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