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विश्लेषण

स्टूडेंट प्रोटेस्ट के दौरान देश के प्रधानमंत्री को और दूसरे मंत्रियों को गाली दी गई

आखिर छात्र आंदोलन में गालियों का 'सिलेबस' किसने पढ़ाया?

प्रदर्शन की भाषा या लोकतंत्र की पराजय?

 विश्लेषण : नई दिल्ली। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां विरोध-प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इतिहास गवाह है कि देश में अनेक बड़े जनआंदोलन हुए, जिनमें छात्रों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और विभिन्न छात्र आंदोलनों तक—देश ने अनेक ऐसे अवसर देखे, जब युवाओं ने अपनी आवाज बुलंद की।

लेकिन हाल के कुछ प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। इन वीडियो में कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अत्यंत अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का प्रयोग करते हुए सुनाई देने का दावा किया जा रहा है।

इन वीडियो की प्रामाणिकता और परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि अलग विषय है, लेकिन यदि ऐसे दृश्य वास्तविक हैं, तो यह केवल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद की गिरती मर्यादा का प्रश्न बन जाता है।

विरोध का अधिकार, लेकिन भाषा की भी जिम्मेदारी

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना पूरी तरह वैध है। किसी भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सार्वजनिक पदाधिकारी के निर्णयों पर तीखा विरोध, नारेबाजी और राजनीतिक आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।

लेकिन सवाल तब उठता है जब राजनीतिक विरोध की जगह व्यक्तिगत अपमान, अभद्र भाषा और अश्लील गालियां लेने लगें।

क्या लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करने का यही तरीका बचा है?

क्या विरोध का अर्थ अब केवल अपशब्द बोलना रह गया है?

आखिर यह भाषा आई कहां से?

यदि वास्तव में छात्र या छात्राओं द्वारा अत्यंत अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया गया, तो यह केवल राजनीति का नहीं बल्कि शिक्षा और सामाजिक संस्कार का भी विषय है।

देश के किसी भी विद्यालय या महाविद्यालय के पाठ्यक्रम में गाली देना नहीं पढ़ाया जाता।

शिक्षक विद्यार्थियों को संवाद, तर्क, बहस, संविधान और नागरिक शिष्टाचार सिखाते हैं।

फिर प्रश्न उठता है—

इतनी आक्रामक और अभद्र भाषा सीखने का स्रोत क्या है?

क्या यह सोशल मीडिया की आक्रामक राजनीतिक संस्कृति का प्रभाव है?

क्या यह भीड़ की मनोवृत्ति है?

या फिर कुछ संगठित समूह प्रदर्शन के दौरान माहौल को उग्र बनाने के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर बिना निष्पक्ष जांच के देना संभव नहीं है, लेकिन इन पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए।

स्टूडेंट प्रोटेस्ट के दौरान कुछ लड़कियां जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही थीं, उसका इस्तेमाल रेड लाइट एरिया की लड़कियां भी नहीं करती हैं।

स्टूडेंट प्रोटेस्ट में गली देने वाली स्टूडेंट हो ही नहीं सकती। प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया और कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के बीच यह सवाल उठाया गया कि अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले सभी लोग वास्तव में छात्र थे या नहीं। कुछ लोगों ने आशंका जताई कि आंदोलन की छवि खराब करने के उद्देश्य से बाहरी या किराए पर लाए गए लोग भी भीड़ में शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, इस दावे की अब तक किसी आधिकारिक एजेंसी या स्वतंत्र जांच से पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह आवश्यक है कि संबंधित वीडियो और घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले लोग छात्र थे या बाहरी तत्व।

यदि किसी ने जानबूझकर आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

मुद्दा व्यक्ति नहीं, सामाजिक संस्कृति का है

यह लेख किसी एक नेता के समर्थन या विरोध का नहीं है।

आज यदि प्रधानमंत्री के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग हो सकता है, तो कल यही भाषा किसी मुख्यमंत्री, किसी न्यायाधीश, किसी शिक्षक, किसी पत्रकार या किसी सामान्य नागरिक के लिए भी प्रयोग हो सकती है।

सार्वजनिक संवाद की भाषा यदि लगातार गिरती जाएगी, तो लोकतांत्रिक बहस की गुणवत्ता भी कमजोर होगी।

सोशल मीडिया ने बदली आंदोलन की भाषा

पिछले कुछ वर्षों में आंदोलन केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़े जाने लगे हैं।

आज एक वायरल वीडियो लाखों लोगों तक कुछ ही मिनटों में पहुंच जाता है।

दुर्भाग्य से कई बार सबसे अधिक वायरल वही सामग्री होती है जिसमें सबसे अधिक उत्तेजना, गाली-गलौज या टकराव दिखाई देता है।

इस प्रवृत्ति ने शांतिपूर्ण संवाद को पीछे धकेल दिया है।

क्या आयोजकों की भी जिम्मेदारी बनती है?

यदि किसी प्रदर्शन में अशोभनीय नारे लगाए जाते हैं, तो आयोजकों की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसी भाषा को रोकें।

लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका नेतृत्व अनुशासन और मर्यादा बनाए रखे।

यदि मंच से कोई अपमानजनक भाषा बोले और कोई रोकने वाला न हो, तो प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेंगे।

मीडिया की भूमिका

मीडिया का दायित्व किसी भी वीडियो को बिना जांच के अंतिम सत्य घोषित करना नहीं है।

लेकिन यदि किसी घटना के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हों, तो उसका निष्पक्ष विश्लेषण भी मीडिया की जिम्मेदारी है।

यदि सार्वजनिक मंच पर अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ है, तो यह केवल राजनीतिक खबर नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी है।

बुजुर्गों के प्रति सम्मान

भारतीय संस्कृति में आयु का सम्मान एक महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य माना गया है।

किसी भी बुजुर्ग व्यक्ति के प्रति असम्मानजनक भाषा का प्रयोग—चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो—समाज में गलत संदेश देता है।

सम्मान का अर्थ राजनीतिक सहमति नहीं होता।

किसी से असहमति रखते हुए भी शालीन भाषा में अपनी बात कही जा सकती है।

जांच की मांग क्यों?

यदि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो वास्तविक हैं और उनमें दिखाई देने वाले लोग किसी संगठित समूह का हिस्सा थे, तो यह जानना सार्वजनिक हित में हो सकता है कि—

  • क्या वे वास्तव में छात्र थे?
  • क्या वे किसी संगठन से जुड़े थे?
  • क्या यह स्वतःस्फूर्त नारे थे या पूर्व नियोजित?
  • क्या आयोजकों ने ऐसी भाषा का विरोध किया?

इन प्रश्नों की जांच तथ्यों के आधार पर ही होनी चाहिए, न कि अफवाहों के आधार पर।

लोकतंत्र में भाषा भी लोकतांत्रिक होनी चाहिए

लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता।

लोकतंत्र संवाद से चलता है।

संवाद सम्मान से चलता है।

यदि राजनीतिक असहमति की जगह केवल गालियां रह जाएं, तो लोकतंत्र का स्तर भी कमजोर होने लगता है।

व्यंग्य

लगता है अब आंदोलन का नया सिलेबस जारी हो गया है।

पहला पीरियड—नारेबाजी।

दूसरा पीरियड—लाइव स्ट्रीम।

तीसरा पीरियड—हैशटैग।

और चौथा पीरियड—ऐसी भाषा, जिसे सुनकर स्कूल के हिंदी शिक्षक छुट्टी मांग लें!

अब सवाल यह नहीं कि कौन किसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है।

सवाल यह है कि लोकतंत्र की भाषा कौन बचाएगा?

विश्लेषण

किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विरोध, प्रदर्शन और सरकार की आलोचना पूरी तरह वैध हैं। लेकिन यदि सार्वजनिक जीवन में अशोभनीय भाषा सामान्य बनती जाती है, तो इसका प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संवाद, शिक्षा और आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ता है।

इसलिए आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल, छात्र संगठन, नागरिक समाज और मीडिया—सभी सार्वजनिक विमर्श में शालीनता और तथ्यों पर आधारित बहस को बढ़ावा दें। इससे लोकतांत्रिक असहमति भी मजबूत होगी और सामाजिक मर्यादा भी बनी रहेगी।

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