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विश्लेषण

फेरी वाला बनाम फाइलों वाला भारत

रोजगार बढ़ाने की बातें बहुत हैं, लेकिन छोटे व्यापारियों पर बढ़ते नियम-कायदों का बोझ कहीं उनके हौसले को ही न कुचल दे।

विश्लेषण: कभी भारत की पहचान उसकी मंडियों, हाट-बाजारों और गली-गली घूमकर सामान बेचने वाले फेरीवालों से होती थी। सुबह होते ही साइकिल, ठेला या कंधे पर टोकरी उठाए लोग गलियों में निकल पड़ते थे। कोई सब्जी बेचता था, कोई बर्तन, कोई कपड़े, तो कोई बच्चों के खिलौने। उनके लिए यही दुकान थी, यही पूंजी थी और यही सम्मानजनक जीवन का माध्यम।

आज तस्वीर बदल रही है। शहर बड़े हो गए, सड़कें चौड़ी हो गईं, मॉल और सुपरमार्केट बढ़ गए, लेकिन सबसे ज्यादा छोटा होता चला गया वह व्यक्ति, जो मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाना चाहता है।

सरकारें रोजगार बढ़ाने के दावे करती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि रोजगार पैदा करने से पहले उसके लिए इतने नियम बना दिए जाते हैं कि छोटा आदमी सोचने लगता है—“कमाऊं या कागज भरूं?”

जब फेरी वाले की मुलाकात फाइलों से हुई

एक समय था जब फेरी लगाने के लिए केवल हिम्मत और मेहनत चाहिए होती थी।

आज अगर वही व्यक्ति थोड़ा आगे बढ़कर छोटी दुकान खोलना चाहे तो उसके सामने नियमों की पूरी बारात खड़ी हो जाती है।

सबसे पहले कोई कहेगा—

“नगर निगम में रजिस्ट्रेशन करवाइए।”

फिर दूसरा अधिकारी कहेगा—

“MSME का प्रमाणपत्र बनाइए।”

तीसरा बोलेगा—

“GST लिया?”

चौथा पूछेगा—

“Income Tax Return भरते हैं?”

पांचवां सलाह देगा—

“Labour Registration भी कर लीजिए।”

छठा याद दिलाएगा—

“Fire NOC भी चाहिए।”

सातवां कहेगा—

“Environmental Clearance?”

आठवां बोलेगा—

“Trade License Renew कराया?”

अब बेचारा छोटा दुकानदार सोचता रह जाता है कि दुकान चलाऊं या ऑफिसों के चक्कर लगाऊं?

फेरी वाला व्यापारी कम, कागजी नागरिक ज्यादा बन गया

देश में “Ease of Doing Business” की खूब चर्चा होती है।

लेकिन कभी किसी छोटे फेरी वाले से पूछिए—

उसके लिए Business आसान हुआ है या Compliance?

आज उसका आधा समय सामान खरीदने में जाता है और आधा समय यह समझने में कि अगला फॉर्म कौन-सा भरना है।

सरकारी विभाग भी आखिर क्या करें?

इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है।

हर सरकारी अधिकारी भ्रष्ट नहीं होता।

कई अधिकारी अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाना चाहते हैं।

लेकिन ऊपर से लक्ष्य आता है—

“Revenue बढ़ाइए।”

“Registration बढ़ाइए।”

“Tax Collection बढ़ाइए।”

“Penalty बढ़ाइए।”

यानी ऊपर से आदेश है—

“राजस्व लेकर आइए, तभी आपकी कार्यकुशलता साबित होगी।”

अब अधिकारी भी क्या करे?

उसके सामने भी आंकड़ों का दबाव है।

उधर व्यापारी कहता है—

“साहब! पहले कमाने तो दीजिए।”

छोटे व्यापारी की सबसे बड़ी समस्या—डर

आज गांव का गरीब युवक शहर आने से पहले ही डर जाता है।

उसे लगता है—

कहीं पुलिस न रोक ले।

कहीं नगर निगम चालान न काट दे।

कहीं टैक्स अधिकारी नोटिस न भेज दे।

कहीं लाइसेंस का सवाल न पूछ लिया जाए।

कहीं कोई नया नियम न आ जाए।

नतीजा—

वह शहर आने से पहले ही हार मान लेता है।

क्या हर छोटा व्यापारी टैक्स चोर है?

यह सबसे बड़ा प्रश्न है।

यदि कोई करोड़ों का कारोबार कर रहा है तो उसके लिए विस्तृत नियम स्वाभाविक हैं।

लेकिन जो व्यक्ति दिनभर धूप में घूमकर 700–800 रुपये कमाता है, क्या उसके लिए भी वही नियम लागू होने चाहिए?

व्यवस्था और सुविधा के बीच संतुलन जरूरी है।

रोजगार बनाम अनुपालन

आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत रोजगार की है।

लेकिन यदि रोजगार शुरू करने से पहले दर्जनों औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ें तो गरीब आदमी रोजगार शुरू ही नहीं करेगा।

बेरोजगारी केवल नौकरी की कमी से नहीं बढ़ती।

कई बार अत्यधिक जटिल प्रक्रियाएं भी लोगों को काम शुरू करने से रोक देती हैं।

डिजिटल इंडिया अच्छी पहल है, लेकिन…

ऑनलाइन व्यवस्था निश्चित रूप से पारदर्शिता लाती है।

लेकिन कल्पना कीजिए—

एक फेरी वाला, जिसने मुश्किल से दसवीं तक पढ़ाई की है।

उससे कहा जाए—

OTP डालिए।

PAN लिंक कराइए।

Aadhaar Verify कीजिए।

Portal Login कीजिए।

Digital Signature लगाइए।

Return File कीजिए।

क्या यह उसके लिए आसान होगा?

डिजिटल व्यवस्था तभी सफल है जब वह आम आदमी के लिए भी सरल हो।

व्यंग्य यही है…

देश कहता है—

“Self Employment करो।”

व्यक्ति कहता है—

“ठीक है।”

फिर व्यवस्था कहती है—

“पहले Registration।”

फिर—

“License।”

फिर—

“GST।”

फिर—

“Return।”

फिर—

“Inspection।”

फिर—

“Renewal।”

फिर—

“Penalty।”

आखिर में छोटा व्यापारी कहता है—

“साहब! मैं व्यापार करूं या आपकी फाइलें पूरी करूं?”

समाधान क्या हो सकता है?

व्यंग्य का उद्देश्य केवल आलोचना नहीं, बल्कि समाधान की ओर संकेत करना भी है।

  • छोटे और फेरी व्यापारियों के लिए सरल एवं एकीकृत पंजीकरण व्यवस्था हो।
  • बहुत छोटे कारोबारियों को अनावश्यक अनुपालनों से राहत मिले।
  • विभिन्न विभागों की प्रक्रियाओं को एक मंच पर लाया जाए।
  • प्रारंभिक वर्षों में छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहन दिया जाए।
  • जागरूकता और सहायता केंद्र बनाए जाएं, ताकि लोग नियमों को समझ सकें।

विश्लेषण

हमारा देश मेहनतकश लोगों का देश है।

यहां गरीब आदमी भी मेहनत करके सम्मानपूर्वक जीना चाहता है।

उसे मुफ्त की सहायता से ज्यादा अवसर चाहिए।

उसे भाषण नहीं, सरल व्यवस्था चाहिए।

उसे अनुदान से ज्यादा विश्वास चाहिए।

और सबसे बड़ी बात—

उसे यह भरोसा चाहिए कि यदि वह ईमानदारी से काम करेगा तो व्यवस्था उसकी राह आसान बनाएगी, कठिन नहीं।

फेरी लगाने वाला व्यक्ति अर्थव्यवस्था पर बोझ नहीं होता, बल्कि उसी अर्थव्यवस्था की सबसे मजबूत नींव होता है।

यदि व्यवस्था ऐसी बन जाए कि छोटा व्यापारी नियमों के जंगल में भटकने के बजाय अपने व्यापार पर ध्यान दे सके, तो रोजगार भी बढ़ेगा, राजस्व भी बढ़ेगा और देश की आर्थिक प्रगति भी अधिक समावेशी होगी।

आखिरकार, एक मजबूत अर्थव्यवस्था की शुरुआत अक्सर किसी बड़े उद्योगपति से नहीं, बल्कि उसी छोटे फेरी वाले से होती है, जो हर सुबह ईमानदारी से अपनी रोज़ी कमाने निकलता है।

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