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विश्लेषण

“चापलूसी की कलम और सत्ता का गलियारा”: लोकतंत्र में पत्रकार और नौकरशाह की भूमिका

जब सवालों की जगह प्रशंसा लिखी जाने लगे, तब लोकतंत्र की सेहत कैसी रहती है?

विशेष विश्लेषण : यह लेख किसी व्यक्ति, संस्था, दल या सेवा के विरुद्ध नहीं है। इसका उद्देश्य लोकतंत्र, पत्रकारिता और प्रशासन में नैतिक मूल्यों पर व्यंग्य के माध्यम से विमर्श प्रस्तुत करना है।

भूमिका: लोकतंत्र की दो कुर्सियाँ

लोकतंत्र में दो कुर्सियाँ बड़ी दिलचस्प होती हैं।

एक पर बैठता है पत्रकार, जिसके हाथ में कलम और कैमरा होता है।

दूसरी पर बैठता है नौकरशाह, जिसके हाथ में फाइल और कानून होता है।

एक का काम है सवाल पूछना।

दूसरे का काम है नियम लागू करना।

लेकिन कभी-कभी दोनों पर एक ही बीमारी का असर हो जाता है—चापलूसी

और तब लोकतंत्र का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है।

चापलूसी क्या है?

चापलूसी केवल “जी सर” कहना नहीं है।

चापलूसी वह कला है जिसमें—

गलती भी उपलब्धि लगने लगती है।

विफलता भी ऐतिहासिक सफलता बन जाती है।

और सवाल पूछना “असभ्यता” घोषित कर दिया जाता है।

व्यंग्य कहता है—

“जहाँ सत्य असहज लगे और प्रशंसा सहज, वहाँ सावधान हो जाइए।”

अध्याय 1: चापलूस पत्रकार

पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है—

सत्ता से प्रश्न।

लेकिन यदि प्रश्न गायब हो जाएं और केवल प्रशंसा बच जाए…

तो समाचार धीरे-धीरे विज्ञापन जैसा दिखने लगता है।

फिर खबर कुछ ऐसी होती है—

“सूरज आज भी सरकार की अनुमति से निकला।”

“बारिश भी प्रशासन की दूरदर्शिता से हुई।”

“ट्रैफिक जाम जनता की देशभक्ति का प्रतीक है।”

 

माइक का नया उपयोग

पहले पत्रकार पूछता था—

“ऐसा क्यों हुआ?”

अब कभी-कभी वह पूछता है—

“सर, आपकी दूरदर्शिता पर कुछ कहिए।”

और यदि जवाब मिल जाए—

तो अगला प्रश्न—

“सर, इतनी दूरदर्शिता आती कहाँ से है?”

लोकतंत्र मुस्कुराता है…

संविधान चश्मा उतारकर देखता है…

और जनता रिमोट बदल देती है।

अध्याय 2: चापलूस नौकरशाह

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार है—

निष्पक्षता।

लेकिन यदि फाइल से पहले चेहरे देखे जाने लगें…

तो नियम धीरे-धीरे कमजोर होने लगते हैं।

चापलूस नौकरशाह की सबसे बड़ी योग्यता होती है—

फाइल से अधिक चेहरे पढ़ना।

फाइल का विज्ञान

एक ही नियम।

एक ही कानून।

एक ही आवेदन।

लेकिन…

पहचान बदलते ही गति बदल जाती है।

साधारण नागरिक की फाइल—

“विचाराधीन।”

प्रभावशाली व्यक्ति की फाइल—

“तत्काल।”

व्यंग्य यहीं जन्म लेता है।

पत्रकार और नौकरशाह की दोस्ती

दोस्ती बुरी नहीं।

लोकतंत्र में संवाद आवश्यक है।

लेकिन…

यदि दोस्ती इतनी गहरी हो जाए कि खबर से पहले फोन आए—

तो समस्या शुरू होती है।

पत्रकार कहे—

“सर, क्या लिखना है?”

और अधिकारी कहे—

“जो उचित समझो… बस यह मत लिखना।”

यहीं से पत्रकारिता की परीक्षा शुरू होती है।

ऑफ द रिकॉर्ड का जंगल

“ऑफ द रिकॉर्ड…”

भारतीय पत्रकारिता का सबसे रहस्यमय वाक्य।

कई बार यह आवश्यक होता है।

लेकिन यदि हर सच ऑफ द रिकॉर्ड और हर प्रशंसा ऑन द रिकॉर्ड हो जाए…

तो लोकतंत्र थोड़ा असहज हो जाता है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का नया संस्करण

पत्रकार—

“सर, उपलब्धियाँ?”

अधिकारी—

“बहुत हैं।”

पत्रकार—

“धन्यवाद।”

बस।

प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त।

सवाल पूछने की जरूरत ही क्या?

सिस्टम का नुकसान

सबसे बड़ा नुकसान किसी सरकार का नहीं होता।

सबसे बड़ा नुकसान जनता का होता है।

क्योंकि—

सच्ची समस्या ऊपर तक पहुंचती ही नहीं।

यदि हर रिपोर्ट शानदार हो…

तो सुधार होगा किस बात का?

आलोचना दुश्मनी नहीं होती

लोकतंत्र आलोचना से मजबूत होता है।

प्रशंसा जरूरी है।

लेकिन केवल प्रशंसा…

लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक हो सकती है जितनी केवल नकारात्मकता।

ईमानदार अधिकारी भी हैं, निर्भीक पत्रकार भी

व्यंग्य का उद्देश्य पूरी व्यवस्था को एक रंग में रंगना नहीं है।

देश में हजारों अधिकारी हैं—

जो नियमों के अनुसार निर्णय लेते हैं।

हजारों पत्रकार हैं—

जो दबाव के बावजूद तथ्य सामने लाते हैं।

इन्हीं लोगों की वजह से लोकतंत्र आज भी जीवित और सक्रिय है।

जनता की भूमिका

जनता भी कभी-कभी आसान रास्ता चुन लेती है।

उसे कठिन सवालों से अधिक आसान नारों में रुचि होती है।

लेकिन लोकतंत्र दर्शक दीर्घा से नहीं चलता।

नागरिकों की जागरूकता ही उसकी असली ताकत है।

व्यंग्य का आईना

कल्पना कीजिए…

एक पत्रकार हर खबर में लिखता है—

“सब कुछ उत्कृष्ट है।”

एक अधिकारी हर फाइल पर लिखता है—

“सब कुछ नियमानुसार है।”

और जनता हर चुनाव में कहती है—

“सब कुछ ठीक है।”

यदि वास्तव में सब कुछ ठीक होता…

तो शिकायतें, अदालतें, लोकायुक्त, सूचना का अधिकार और जांच एजेंसियां क्यों होतीं?

पत्रकारिता की असली पहचान

पत्रकार सत्ता विरोधी नहीं होता।

पत्रकार सत्ता समर्थक भी नहीं होता।

पत्रकार का पहला दायित्व—

तथ्य समर्थक होना है।

इसी तरह—

नौकरशाह किसी दल का नहीं होता।

उसकी निष्ठा—

संविधान और कानून के प्रति होती है।

विश्लेषण: लोकतंत्र को चापलूस नहीं, चरित्रवान लोग चाहिए

लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर नहीं करती कि सरकार की कितनी प्रशंसा हुई या कितनी आलोचना।

वह इस बात पर निर्भर करती है कि—

  • क्या पत्रकार बिना भय और बिना पक्षपात के प्रश्न पूछ सकता है?
  • क्या नौकरशाह बिना दबाव और बिना पक्षपात के निर्णय ले सकता है?
  • क्या नागरिक तथ्य और प्रचार के बीच अंतर कर सकता है?

यदि इन तीनों का उत्तर “हाँ” है, तो लोकतंत्र मजबूत है।

और यदि नहीं—

तो व्यंग्य लिखे जाते रहेंगे, कार्टून बनते रहेंगे, बहसें चलती रहेंगी।

क्योंकि लोकतंत्र में व्यंग्य केवल हँसाने के लिए नहीं होता—वह समाज को आईना दिखाने के लिए भी होता है।

शायद यही पत्रकारिता की मर्यादा भी है और प्रशासन की गरिमा भी।

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