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राजनीति

तेल कंपनियों के घाटे पर गोदी मीडिया का शोर, जनता पूछ रही — 44 लाख करोड़ टैक्स का हिसाब कौन देगा?

संपादकीय

नई दिल्ली : पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार और तथाकथित “गोदी मीडिया” विपक्ष के निशाने पर हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि टीवी चैनलों और सरकार समर्थक विश्लेषकों द्वारा लगातार यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण तेल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है, इसलिए जनता को महंगाई “चुपचाप सहनी” चाहिए।

विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों का कहना है कि जब तेल कंपनियां पिछले कई वर्षों में रिकॉर्ड मुनाफा कमा रही थीं, तब आम जनता को कोई राहत नहीं दी गई। उनका दावा है कि पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स और एक्साइज ड्यूटी के जरिए करीब 44 लाख करोड़ रुपये वसूले, जबकि सरकारी तेल कंपनियों ने लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया।

आलोचकों का सवाल है कि यदि तेल कंपनियों ने इतने वर्षों तक भारी लाभ कमाया है, तो मौजूदा वैश्विक संकट के दौरान कुछ समय के लिए जनता को राहत क्यों नहीं दी जा सकती? उनका कहना है कि हर बार घाटे का हवाला देकर महंगाई का बोझ सीधे आम आदमी पर डालना उचित नहीं है।

वहीं सरकार समर्थकों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की मजबूती और भू-राजनीतिक तनावों के कारण तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा है। उनका कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए कई बार कठिन फैसले लेने पड़ते हैं।

इधर सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से ट्रेंड कर रहा है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब मुनाफा हुआ तो उसका फायदा जनता तक क्यों नहीं पहुंचा और अब घाटे की स्थिति में केवल आम नागरिकों से ही त्याग की उम्मीद क्यों की जा रही है।

महंगाई, टैक्स और तेल कंपनियों के मुनाफे को लेकर शुरू हुई यह बहस अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

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