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अर्जेंटीना की अदालत का ऐतिहासिक फैसला: दो गोल्डफिश को मिला ‘संवेदनशील जीव’ का दर्जा

विशेष संवाददाता

कानूनी अधिकारों को मिली मान्यता

ब्यूनस आयर्स | पशु अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अर्जेंटीना की एक अदालत ने दो गोल्डफिश—फेडे (Fede) और मागुई (Magui)—को “संवेदनशील जीव” (Sentient Beings) का दर्जा देते हुए उनके कानूनी अधिकारों को मान्यता दी है। इस फैसले को पशु कल्याण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि अब इन मछलियों को केवल संपत्ति या वस्तु नहीं, बल्कि अधिकार रखने वाले जीव के रूप में देखा जाएगा।

यह मामला ब्यूनस आयर्स के एक प्रतिष्ठित इलाके में स्थित एक सुशी रेस्तरां से शुरू हुआ, जहां दोनों गोल्डफिश को ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कांच के एक छोटे से टैंक में रखा गया था। राह चलते अधिकांश लोग उन्हें सामान्य सजावट का हिस्सा समझकर नजरअंदाज कर देते थे, लेकिन एक दिन एक पशु अधिकार कार्यकर्ता ने उनकी स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दिया और यहीं से इस ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई की शुरुआत हुई।

धूप और शोर के बीच कैद थीं दोनों मछलियां

रेस्तरां के बाहर रखे कांच के छोटे टैंक में दोनों गोल्डफिश दिनभर तेज धूप, सड़क के शोर और सीमित स्थान में रहने को मजबूर थीं। पशु अधिकार संगठन “जाउलास वासियास” (Jaulas Vacías – Empty Cages) के सदस्यों ने इसे मछलियों के लिए अमानवीय और अस्वास्थ्यकर वातावरण बताया।

संगठन के वकील मातियास ट्रुफेरो ने बताया कि कोई भी व्यक्ति थोड़ी देर रुककर उस टैंक को देखता, तो समझ जाता कि वह जीवित प्राणियों के रहने के लिए उपयुक्त नहीं था।

उन्होंने कहा कि मछलियां भी दर्द, तनाव और भय महसूस करती हैं तथा उन्हें केवल सजावटी वस्तु की तरह प्रदर्शित करना पशु क्रूरता की श्रेणी में आता है।

अदालत पहुंचा मामला

एनजीओ ने अर्जेंटीना के पशु क्रूरता निरोधक कानून 14.346 के तहत अदालत में याचिका दायर की। याचिका में कहा गया कि दोनों गोल्डफिश को जिस प्रकार के वातावरण में रखा गया था, वह उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए हानिकारक था।

विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर अदालत को बताया गया कि गोल्डफिश को जीवित रहने के लिए नियंत्रित तापमान, पर्याप्त ऑक्सीजन, स्वच्छ जल और पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है।

अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल दोनों मछलियों को वहां से हटाकर सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने का आदेश दिया।

रेस्तरां ने नहीं किया विरोध

वकील ट्रुफेरो के अनुसार, अदालत के आदेश का रेस्तरां प्रबंधन ने कोई विरोध नहीं किया।

मछलियों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्वक संपन्न हुई और अब दोनों गोल्डफिश एक बड़े तथा वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बनाए गए एक्वेरियम में रह रही हैं।

विशेषज्ञ ने बताया क्यों था टैंक खतरनाक

पशु विशेषज्ञ कार्लोस जोस आगा ने इस मामले की तुलना एक बेहद प्रभावशाली उदाहरण से की।

उन्होंने कहा,

दो गोल्डफिश को इतने छोटे कांच के डिब्बे में रखना लगभग वैसा ही है जैसे दो ध्रुवीय भालुओं को सॉना के अंदर पिंजरे में बंद कर देना।”

उन्होंने बताया कि मछलियां अत्यंत संवेदनशील जीव होती हैं और उनके आसपास का तापमान, पानी की गुणवत्ता, ऑक्सीजन का स्तर तथा अन्य जैविक परिस्थितियां अत्यंत संतुलित होनी चाहिए।

उन्होंने कहा,”मछलियां अंतरिक्ष यात्रियों की तरह होती हैं। वे अपने विशेष वातावरण में रहती हैं और जब उन्हें किसी नए स्थान पर ले

जाया जाता है तो उसी प्रकार की परिस्थितियों को दोबारा तैयार करना आवश्यक होता है। अन्यथा उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है।”

विशेषज्ञ के अनुसार, अब दोनों गोल्डफिश स्वस्थ हैं और पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय दिखाई दे रही हैं।

केवल बचाव नहीं, कानूनी अधिकार भी

इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण मांग केवल मछलियों को बचाना नहीं थी।

एनजीओ ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि दोनों गोल्डफिश को “कानून का विषय” (Subject of Law) अर्थात अधिकार प्राप्त जीव घोषित किया जाए।

अदालत ने इस मांग को स्वीकार करते हुए कहा कि इन मछलियों को केवल संपत्ति या वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता।

यह फैसला भविष्य में ऐसे अनेक मामलों के लिए कानूनी मिसाल बनेगा, जहां जानवरों को अनुचित परिस्थितियों में रखा जाता है।

क्या घर में गोल्डफिश रखना अवैध है?

फैसले के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल उठा कि क्या अब घर में गोल्डफिश रखना गैरकानूनी हो जाएगा?

इस पर ट्रुफेरो ने स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है।

उन्होंने कहा कि केवल एक्वेरियम में मछली रखना अपराध नहीं है।

लेकिन यदि उन्हें ऐसे वातावरण में रखा जाता है जहां पर्याप्त स्थान न हो, भोजन की कमी हो, पानी गंदा हो या उनके साथ क्रूर व्यवहार किया जाए, तो यह कानून का उल्लंघन माना जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि मछली किसी विदेशी (Exotic) प्रजाति की है तो स्थानीय वन्यजीव कानूनों के अनुसार उसके पालन पर अतिरिक्त प्रतिबंध भी लागू हो सकते हैं।

पशु अधिकारों की बदलती सोच

पिछले दो दशकों में दुनिया भर में पशुओं के कानूनी अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हुई है।

अब कई न्यायालय यह मानने लगे हैं कि अनेक जानवर दर्द, खुशी, भय, तनाव और भावनाओं का अनुभव करते हैं, इसलिए उन्हें केवल संपत्ति की श्रेणी में रखना उचित नहीं है।

इसी सोच के चलते कई देशों में न्यायपालिका पशु अधिकारों को नए दृष्टिकोण से देख रही है।

2005 में शुरू हुई थी पहल

गैर-मानव जीवों के लिए पहला हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) मामला वर्ष 2005 में ब्राज़ील में दायर किया गया था।

यह मामला “सुइज़ा” नामक एक चिंपैंजी के लिए था, जिसे एक अभयारण्य में भेजने की मांग की गई थी।

हालांकि अदालत का अंतिम फैसला आने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई।

इसके बाद दुनिया के कई देशों में पशुओं के अधिकारों को लेकर इसी प्रकार की कानूनी लड़ाइयां शुरू हुईं।

अर्जेंटीना की प्रसिद्ध ओरंगुटान ‘सैंड्रा’

अर्जेंटीना में सबसे चर्चित मामलों में सैंड्रा नामक ओरंगुटान का मामला रहा।

सैंड्रा का जन्म जर्मनी में हुआ था और वह लगभग 20 वर्षों तक ब्यूनस आयर्स चिड़ियाघर में रही।

वर्ष 2014 में पर्यावरण कार्यकर्ताओं की याचिका पर अदालत ने उसे “गैर-मानव व्यक्ति” (Non-Human Person) घोषित किया।

अदालत ने कहा कि भले ही उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार नहीं हुआ, लेकिन केवल मनोरंजन के लिए कैद में रखना भी उसके अधिकारों का उल्लंघन है।

चिड़ियाघर से इको पार्क तक

सैंड्रा मामले के बाद अर्जेंटीना में पशु संरक्षण को लेकर बड़े बदलाव हुए।

वर्ष 2016 में ब्यूनस आयर्स चिड़ियाघर को इको पार्क में बदल दिया गया, जहां पशुओं को प्रदर्शन की वस्तु बनाने की परंपरा समाप्त कर दी गई।

कई जानवरों को दुनिया भर के अभयारण्यों में भेजा गया।

सैंड्रा को वर्ष 2019 में अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित सेंटर फॉर ग्रेट एप्स भेज दिया गया, जहां वह अधिक प्राकृतिक वातावरण में रहने लगी।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फेडे और मागुई के मामले में आया फैसला केवल दो गोल्डफिश तक सीमित नहीं रहेगा।

यह निर्णय भविष्य में उन सभी मामलों के लिए आधार बन सकता है, जहां जानवरों को मनोरंजन, सजावट या व्यावसायिक लाभ के लिए अनुचित परिस्थितियों में रखा जाता है।

यदि अदालतें लगातार पशुओं को अधिकार प्राप्त जीव के रूप में स्वीकार करती हैं, तो चिड़ियाघरों, एक्वेरियम, सर्कस और निजी पालतू पशुओं के रख-रखाव से जुड़े कानूनों में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

पशु कल्याण की दिशा में नई शुरुआत

फेडे और मागुई की कहानी यह संदेश देती है कि छोटे से छोटे जीव का भी जीवन सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। अर्जेंटीना की अदालत का यह ऐतिहासिक फैसला दुनिया भर में पशु अधिकारों पर चल रही बहस को नई दिशा दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में अधिक देश ऐसे कानूनी सिद्धांत अपनाकर पशुओं के संरक्षण और उनके अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं।

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