
नई दिल्ली : दक्षिण कोरिया ने अपनी सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए परमाणु-संचालित आक्रमण पनडुब्बियों (SSN) के निर्माण की योजना बनाई है। हालांकि, इस योजना के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु अप्रसार (Nonproliferation) से जुड़ी चिंताएँ भी सामने आई हैं। इन संभावित चिंताओं को ध्यान में रखते हुए सियोल सरकार पहले से ही कूटनीतिक और संस्थागत स्तर पर कदम उठा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उसकी योजना अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानकों के अनुरूप हो।
दक्षिण कोरिया का विदेश मंत्रालय (MOFA) अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी को सियोल आमंत्रित करने की योजना बना रहा है। इस बैठक का उद्देश्य उन सत्यापन प्रक्रियाओं पर चर्चा करना है, जो परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण के लिए आवश्यक होंगी। यह कदम दर्शाता है कि दक्षिण कोरिया अपनी योजना को पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस योजना को उस समय महत्वपूर्ण बढ़ावा मिला जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 29 अक्टूबर को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग के साथ हुई शिखर बैठक में SSN निर्माण योजना को मंजूरी दी। इसके बाद 13 नवंबर को जारी संयुक्त तथ्य पत्र में यह उल्लेख किया गया कि वाशिंगटन सियोल के साथ मिलकर निर्माण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए काम करेगा, जिसमें ईंधन की आपूर्ति के विकल्प तलाशना भी शामिल है।
परमाणु-संचालित पनडुब्बियों का महत्व उनके दीर्घकालिक संचालन में निहित है। SSN में उपयोग किए जाने वाले परमाणु रिएक्टर समृद्ध यूरेनियम से संचालित होते हैं, जो उन्हें बिना ईंधन भरे 30 से 40 वर्षों तक संचालन की क्षमता प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, दक्षिण कोरिया की वर्तमान डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को हर 20 दिनों में बैटरियों को चार्ज करने के लिए सतह पर आना पड़ता है, जिससे उनकी गोपनीयता और संचालन क्षमता सीमित हो जाती है।
हालांकि, परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण में उपयोग होने वाले ईंधन को लेकर वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंताएँ हैं। अमेरिका और ब्रिटेन की SSN पनडुब्बियाँ उच्च समृद्ध यूरेनियम (HEU) का उपयोग करती हैं, जिसका संवर्धन स्तर 60 प्रतिशत से अधिक होता है। यही सामग्री परमाणु हथियारों के निर्माण में भी उपयोग की जा सकती है। इसी कारण, ऑस्ट्रेलिया के AUKUS कार्यक्रम के तहत अमेरिकी डिजाइन की HEU आधारित पनडुब्बियों के अधिग्रहण में IAEA की सख्त निगरानी शामिल है।
दक्षिण कोरिया ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि उसकी पनडुब्बियाँ HEU का उपयोग करेंगी या निम्न समृद्ध यूरेनियम (LEU) का। LEU का संवर्धन स्तर इतना नहीं होता कि उसे परमाणु हथियारों में उपयोग किया जा सके, इसलिए इसका उपयोग अप्रसार चिंताओं को कुछ हद तक कम कर सकता है। फिर भी, चाहे HEU का उपयोग हो या LEU का, IAEA की सत्यापन प्रक्रिया अनिवार्य होगी।
इस परियोजना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा परमाणु ईंधन की आपूर्ति है। दक्षिण कोरिया वर्तमान में अपने नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए अमेरिकी तकनीक और ईंधन पर निर्भर है, जो “123 समझौते” के तहत नियंत्रित होता है। यह समझौता दक्षिण कोरिया को अमेरिकी परमाणु सामग्री का उपयोग केवल नागरिक उद्देश्यों के लिए करने की अनुमति देता है और सैन्य उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
यदि दक्षिण कोरिया अपनी पनडुब्बियों के लिए परमाणु ईंधन प्राप्त करना चाहता है, तो अमेरिका को इस समझौते के अनुच्छेद 13 में संशोधन करना होगा। हालांकि इस संशोधन के लिए अमेरिकी कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी आवश्यक नहीं होगी, लेकिन इसे लागू करने से पहले 90 दिनों की समीक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा। यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकती है, विशेषकर तब जब कुछ अमेरिकी सांसद पहले ही इस मुद्दे पर चिंता जता चुके हैं।
30 जनवरी को अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने राष्ट्रपति ट्रंप को पत्र लिखकर दक्षिण कोरिया की इस योजना से जुड़े अप्रसार जोखिमों पर चिंता व्यक्त की थी। उनका मानना है कि यदि इस प्रकार की परियोजनाओं को बिना पर्याप्त नियंत्रण के आगे बढ़ाया गया, तो यह अन्य देशों को भी इसी दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे वैश्विक अप्रसार व्यवस्था कमजोर हो सकती है।
दूसरी ओर, दक्षिण कोरिया का तर्क है कि उसकी योजना पूरी तरह रक्षात्मक है और इसका उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है। उत्तर कोरिया की बढ़ती सैन्य क्षमताओं और परमाणु कार्यक्रम को देखते हुए सियोल अपनी नौसैनिक शक्ति को उन्नत करना चाहता है, ताकि संभावित खतरों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।
इसी संदर्भ में, दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच हालिया घटनाक्रम भी उल्लेखनीय हैं। 6 अप्रैल को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने उत्तर कोरिया के प्रति एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए हाल के ड्रोन घुसपैठ मामलों पर खेद व्यक्त किया। यह पहला अवसर था जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी और इसे “कुछ लापरवाह व्यक्तियों” की कार्रवाई बताया, जिसने अनावश्यक सैन्य तनाव पैदा किया।
इस बयान को उत्तर कोरिया की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया के महासचिव किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने ली के बयान की सराहना करते हुए इसे “स्पष्ट और व्यापक दृष्टिकोण” वाला बताया। यह प्रतिक्रिया संकेत देती है कि उत्तर कोरिया इस प्रकार के कूटनीतिक संकेतों को सकारात्मक रूप से ले रहा है, हालांकि इससे तुरंत किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है।
फरवरी में भी दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्री चुंग डोंग-यंग ने इसी मुद्दे पर खेद व्यक्त किया था, जिस पर किम यो जोंग ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, भले ही औपचारिक वार्ता की संभावना फिलहाल कम हो।
ड्रोन घुसपैठ के मामले में यह आरोप लगाया गया था कि तीन दक्षिण कोरियाई नागरिकों, एक राष्ट्रीय खुफिया सेवा के कर्मचारी और दो सक्रिय सैन्य अधिकारियों ने सितंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच चार बार उत्तर कोरिया के हवाई क्षेत्र में ड्रोन भेजे। इस प्रकार की घटनाएं दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ाने का कारण बन सकती हैं, इसलिए इन पर नियंत्रण आवश्यक है।
विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति ली का यह बयान एक कूटनीतिक प्रयास का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य तनाव को कम करना और संवाद के लिए एक अनुकूल माहौल तैयार करना है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों में यह संभावना कम ही है कि दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता जल्द शुरू हो सके।
दक्षिण कोरिया की परमाणु पनडुब्बी योजना और उत्तर कोरिया के साथ उसके संबंध, दोनों ही क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं। एक ओर सियोल अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश भी कर रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। IAEA, संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाएं यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं कि दक्षिण कोरिया की योजना अप्रसार नियमों का उल्लंघन न करे और क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
निष्कर्षतः, दक्षिण कोरिया की SSN पनडुब्बी योजना एक जटिल और बहुआयामी मुद्दा है, जिसमें सुरक्षा, तकनीकी, कूटनीतिक और कानूनी पहलू शामिल हैं। जहां एक ओर यह योजना देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर सकती है, वहीं दूसरी ओर यह वैश्विक अप्रसार व्यवस्था के लिए चुनौतियां भी उत्पन्न कर सकती है। ऐसे में संतुलित और पारदर्शी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सके।












