बीएमसी चुनाव 2026: एआईएमआईएम के “छिपे समर्थन” से बीजेपी की अप्रत्याशित जीत !
समीर सिंह 'भारत' : मुख्य संपादक

मुंबई | विशेष रिपोर्ट : बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2026 के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। देश की सबसे अमीर नगरपालिका कही जाने वाली बीएमसी में इस बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता हासिल कर ली है। यह जीत केवल एक नगर निगम चुनाव तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। चुनावी नतीजों के बाद सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या बीजेपी की इस जीत के पीछे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का कोई “परोक्ष” या “छुपा हुआ” समर्थन रहा?
हालांकि, बीजेपी और एआईएमआईएम—दोनों ही दलों ने किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष गठबंधन से इनकार किया है, लेकिन चुनावी आंकड़े, वोट ट्रांसफर पैटर्न और कई वार्डों के नतीजे ऐसे संकेत देते हैं जिन्होंने इस बहस को जन्म दिया है।

बीएमसी चुनाव 2026: नतीजों का संक्षिप्त खाका
बीएमसी की कुल 227 सीटों में से बीजेपी ने इस बार 120 से अधिक सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। शिवसेना (यूबीटी), कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठबंधन अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सका, जबकि एआईएमआईएम ने सीमित सीटें जीतने के बावजूद कई मुस्लिम-बहुल वार्डों में निर्णायक भूमिका निभाई।
चुनावी आंकड़ों के अनुसार, कई ऐसे वार्ड रहे जहां एआईएमआईएम के उम्मीदवारों ने कांग्रेस-शिवसेना गठबंधन के वोट काटे, जिससे बीजेपी को सीधा फायदा मिला। यही वह बिंदु है, जहां से “परोक्ष समर्थन” की चर्चा तेज हुई।
एआईएमआईएम की भूमिका: प्रत्यक्ष नहीं, पर प्रभावशाली
एआईएमआईएम ने चुनाव से पहले यह स्पष्ट किया था कि वह “सेक्युलर वोटर्स की आवाज” बनने के लिए मैदान में उतर रही है। पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कई रैलियों में बीजेपी और कांग्रेस—दोनों पर हमला बोला। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एआईएमआईएम की रणनीति का सबसे अधिक नुकसान विपक्षी गठबंधन को हुआ।
मुंबई के कई मुस्लिम-बहुल इलाकों—जैसे मानखुर्द, कुर्ला, भायखला और नागपाड़ा—में एआईएमआईएम ने अच्छी खासी वोट हिस्सेदारी हासिल की, लेकिन सीटें कम जीत पाई। इन इलाकों में कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के उम्मीदवार दूसरे या तीसरे स्थान पर खिसक गए, जबकि बीजेपी उम्मीदवार मामूली अंतर से जीतने में सफल रहे।
क्या यह ‘वोट कटवा’ राजनीति थी?
विपक्षी दलों का आरोप है कि एआईएमआईएम ने जानबूझकर ऐसे वार्डों में उम्मीदवार उतारे जहां मुकाबला कड़ा था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि एआईएमआईएम चुनाव नहीं लड़ती, तो इन सीटों पर विपक्ष की जीत संभव थी।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“एआईएमआईएम की मौजूदगी ने विपक्षी वोटों को विभाजित किया और बीजेपी को सीधा लाभ पहुंचाया। भले ही यह समर्थन प्रत्यक्ष न हो, लेकिन इसका असर वैसा ही रहा।”
वहीं शिवसेना (यूबीटी) के नेताओं ने इसे “बीजेपी-एआईएमआईएम की बी-टीम राजनीति” करार दिया।
बीजेपी का पक्ष: आरोप बेबुनियाद
बीजेपी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी के महाराष्ट्र अध्यक्ष ने कहा कि यह जीत बीजेपी की संगठनात्मक मजबूती, विकास के एजेंडे और मुंबई की जनता के विश्वास का परिणाम है।
बीजेपी प्रवक्ता के अनुसार,
“हमारी जीत को किसी और के खाते में डालना जनता के फैसले का अपमान है। एआईएमआईएम एक स्वतंत्र पार्टी है और उसने अपने दम पर चुनाव लड़ा। बीजेपी का उनसे कोई समझौता नहीं है।”
बीजेपी नेताओं ने यह भी कहा कि विपक्ष अपनी हार छिपाने के लिए इस तरह के आरोप लगा रहा है।
एआईएमआईएम की सफाई: ‘हम किसी की बी-टीम नहीं’
एआईएमआईएम ने भी बीजेपी के साथ किसी भी तरह के तालमेल से इनकार किया है। पार्टी के महाराष्ट्र अध्यक्ष ने कहा कि एआईएमआईएम ने मुस्लिम समुदाय और हाशिए पर पड़े वर्गों के मुद्दों को उठाने के लिए चुनाव लड़ा।
उनका कहना था,
“हम न बीजेपी की बी-टीम हैं और न कांग्रेस की। हमारा उद्देश्य अपनी विचारधारा और समुदाय की राजनीति करना है। अगर किसी को हमारे चुनाव लड़ने से नुकसान हुआ, तो यह उनकी रणनीतिक विफलता है।”
चुनावी गणित और ‘हिडन सपोर्ट’ की बहस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आधुनिक चुनाव केवल गठबंधन और घोषणाओं से नहीं, बल्कि वोट ट्रांसफर और वोट कटने के गणित से भी जीते जाते हैं। बीएमसी चुनाव 2026 में यही गणित बीजेपी के पक्ष में गया।
विशेषज्ञों के अनुसार, एआईएमआईएम को मिले 5–8 प्रतिशत वोट कई वार्डों में निर्णायक साबित हुए। ये वही वोट थे जो पहले कांग्रेस या शिवसेना को मिलते थे। नतीजतन, बीजेपी को बिना मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंध लगाए भी जीत मिल गई।

मुंबई की राजनीति में बदलाव
बीएमसी पर बीजेपी की जीत का मतलब सिर्फ नगर निगम की सत्ता नहीं है। यह मुंबई के प्रशासन, बजट, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं पर बीजेपी के सीधे नियंत्रण को भी दर्शाता है। बीएमसी का सालाना बजट कई राज्यों से भी बड़ा माना जाता है।
राजनीतिक दृष्टि से यह जीत बीजेपी को महाराष्ट्र में और मजबूत करती है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य की राजनीति पहले से ही अस्थिर गठबंधनों से गुजर रही है।
मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा?
एआईएमआईएम की बढ़ती मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि मुस्लिम राजनीति में एक नया ध्रुव उभर रहा है। जहां पहले कांग्रेस को मुस्लिम वोटों का स्वाभाविक लाभ मिलता था, वहीं अब यह वोट बैंक बिखरता दिख रहा है।
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि एआईएमआईएम का यह उभार बीजेपी के लिए अप्रत्यक्ष रूप से फायदेमंद साबित हो रहा है, क्योंकि इससे विपक्षी एकजुटता कमजोर होती है।
आगे की राह: 2029 और उससे आगे
बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजे 2029 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए संकेतक माने जा रहे हैं। यदि विपक्ष एआईएमआईएम की चुनौती का कोई ठोस समाधान नहीं निकालता, तो वोटों का यह विभाजन भविष्य में भी बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है।
वहीं एआईएमआईएम के सामने भी सवाल है कि क्या वह केवल “वोट कटवा” की छवि से बाहर निकलकर सत्ता में वास्तविक भागीदारी की राजनीति कर पाएगी।
बीएमसी चुनाव 2026 ने यह साफ कर दिया है कि राजनीति अब केवल प्रत्यक्ष गठबंधनों की नहीं रही। “परोक्ष समर्थन”, वोट ट्रांसफर और रणनीतिक उम्मीदवार चयन जैसे तत्व चुनावी नतीजों को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
बीजेपी की जीत और एआईएमआईएम की भूमिका को लेकर चल रही बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। लेकिन एक बात तय है—मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी। यहां हर चुनाव एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगा।












