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रहस्य -सनसनी

बेगुनकुदार रेलवे स्टेशन: एक भुतहा कहानी या अंधविश्वास ?

समीर कुमार सिंह : प्रधान संपादक

पुरुलिया : पश्चिम बंगाल का पुरुलिया जिला वैसे तो अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, पहाड़ियों और झरनों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यहां का बेगुनकुदार रेलवे स्टेशन (Begunkudar Railway Station) एक रहस्यमयी और डरावनी कहानी के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह स्टेशन न केवल यात्रियों बल्कि रेलवे कर्मचारियों के बीच भी “भुतहा स्टेशन” के रूप में प्रसिद्ध है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बेगुनकुदार स्टेशन की शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी। यह छोटा-सा स्टेशन आद्रा–झालदा रेल सेक्शन पर आता है। जब इसका निर्माण हुआ, तो यहां आसपास के गाँव वालों ने बहुत उम्मीदें लगाई थीं कि अब उनकी कनेक्टिविटी बेहतर होगी। लेकिन उद्घाटन के कुछ ही समय बाद, इस स्टेशन को लेकर एक अजीब सी घटना सामने आई जिसने इसे “हॉन्टेड स्टेशन” का दर्जा दे दिया।

पहली भूतिया घटना

कहा जाता है कि स्टेशन पर एक महिला की आत्मा दिखाई देती थी। स्थानीय लोगों का दावा है कि वह महिला सफेद साड़ी में अक्सर प्लेटफॉर्म और पटरियों के पास घूमती दिखती थी। लोग मानते थे कि यह आत्मा एक संथाल आदिवासी महिला की है, जिसकी असामयिक मौत ट्रेन दुर्घटना में हो गई थी।

रेलवे कर्मचारियों और यात्रियों ने बार-बार शिकायत की कि वे आधी रात को इस महिला को स्टेशन पर घूमते हुए देखते हैं। यहां तक कि कई ट्रेन ड्राइवरों ने भी कहा कि उन्हें ट्रैक पर खड़ी एक औरत दिखाई देती थी, लेकिन जैसे ही वे पास जाते, वह अचानक गायब हो जाती।

अधिकारियों की मौत और डर

स्थानीय मान्यता है कि 1960 के दशक में स्टेशन मास्टर और कुछ रेलवे अधिकारियों की रहस्यमय मौतें भी हुईं। कहा जाता है कि आत्मा से डरकर एक स्टेशन मास्टर ने अपनी नौकरी छोड़ दी और दूसरे की मौत हार्ट अटैक से हो गई। इन घटनाओं ने अफवाह को और मजबूत कर दिया कि यह स्टेशन वाकई भुतहा है।

42 साल तक बंद रहा स्टेशन

इन घटनाओं और लगातार फैलती अफवाहों के कारण रेलवे ने 1960 के दशक के अंत में बेगुनकुदार स्टेशन को बंद कर दिया।
करीब 42 साल तक यह स्टेशन वीरान पड़ा रहा।पटरियों पर ट्रेनें तो गुजरती थीं, लेकिन यहां कोई रुकता नहीं था। आसपास के लोग रात में स्टेशन के पास जाने से भी डरते थे।

स्थानीय लोगों की मान्यता

गाँव वालों का कहना था कि रात होते ही स्टेशन पर अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती थीं। कभी रोने की आवाज, कभी ट्रेन की सीटी जैसी गूंज। कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्होंने आधी रात को स्टेशन पर जलती हुई लालटेन और सफेद कपड़ों वाली औरत को देखा है।यह मान्यताएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती गईं और स्टेशन को “भूतिया” का तमगा मिल गया।

पुनः उद्घाटन – 2009

लेकिन समय बदला। 2000 के दशक में जब रेलवे ने नए सर्वे किए और स्थानीय लोगों ने भी बार-बार स्टेशन को खोलने की मांग की, तब सरकार ने इसे फिर से चालू करने का निर्णय लिया।

2009 में बेगुनकुदार रेलवे स्टेशन का दोबारा उद्घाटन हुआ।
उस दिन बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। ट्रेनों ने यहां रुकना शुरू किया और रेलवे ने इस “भूतिया” कहानी को अंधविश्वास करार दिया।

भूतिया कहानी का असर

हालांकि स्टेशन फिर से खुल गया, लेकिन डर और अंधविश्वास आज भी बना हुआ है।

  • बहुत कम लोग शाम ढलने के बाद यहां रुकना पसंद करते हैं।

  • रात में यहां का प्लेटफॉर्म अक्सर सुनसान रहता है।

  • रेलवे कर्मचारी भी कहते हैं कि वे रात की शिफ्ट में अकेले होने पर अजीब सी बेचैनी महसूस करते हैं।

पर्यटन और आकर्षण

विडंबना यह है कि इस डरावनी छवि ने बेगुनकुदार को एक पर्यटन स्थल भी बना दिया है। कई युवा और रोमांचप्रेमी लोग यहां सिर्फ इस “भूतिया स्टेशन” को देखने आते हैं।कुछ टूर एजेंसियां इसे “हॉन्टेड स्टेशन टूर” पैकेज में भी शामिल करने लगी हैं।

स्थानीय प्रशासन और रेलवे की राय

रेलवे और जिला प्रशासन बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि “भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।”
उनके अनुसार –

  • स्टेशन के बंद होने का कारण अफवाहें और उस समय के अधिकारियों की हिचकिचाहट थी।

  • 42 साल तक यह स्टेशन केवल डर और अंधविश्वास का शिकार रहा।

  • अब यह पूरी तरह से सुरक्षित है और यात्रियों के लिए सुविधाजनक बनाया गया है।

सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू

भारत में भूत-प्रेत और आत्माओं की कहानियां अक्सर रेल से जुड़ी घटनाओं में देखने को मिलती हैं।

  • देर रात की ट्रेनों, सुनसान प्लेटफॉर्म और अंधेरे स्टेशन ऐसे माहौल पैदा करते हैं जहां लोग डर की कहानियां गढ़ते हैं।

  • बेगुनकुदार भी इसी तरह की सामूहिक कल्पना और अंधविश्वास का परिणाम हो सकता है।

मीडिया और लोककथाओं में स्थान

बेगुनकुदार की कहानी समय-समय पर अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में छपती रही है।

  • इसे “भारत का सबसे भूतिया रेलवे स्टेशन” कहा गया।

  • कई यूट्यूबर्स और डाक्यूमेंट्री मेकर्स ने यहां आकर वीडियो बनाए।

  • स्थानीय लोककथाओं में आज भी यह कहानी बच्चों को डराने के लिए सुनाई जाती है।

वर्तमान स्थिति

आज बेगुनकुदार रेलवे स्टेशन पर हर दिन ट्रेनों का आना-जाना होता है। यात्रियों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन रात में यहां अब भी सन्नाटा और डर का माहौल छाया रहता है। रेलवे ने यहां लाइटिंग और सुरक्षा बढ़ाई है, ताकि यात्रियों को कोई दिक्कत न हो।

बेगुनकुदार रेलवे स्टेशन की भूतिया कहानी एक ओर जहां अंधविश्वास और लोककथाओं का उदाहरण है, वहीं दूसरी ओर यह दर्शाती है कि डर और अफवाहें किस तरह किसी जगह की किस्मत बदल सकती हैं। 42 साल तक बंद रहना और आज भी “हॉन्टेड स्टेशन” कहलाना इसकी अनोखी पहचान बन चुका है।

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